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Monday, 19 May 2014

हार कर जीतने वाले को "केजरीवाल" कहते हैं



नतीजे सामने हैं और नया प्रधान मंत्री भी. माननीय नरेन्द्र मोदी जी को इस सफलता की बधाई. देश में बहुत सालों बाद बहुत बड़ा जनादेश और एक सुर का जनादेश सच में सुन के अच्छा ही लगा.

नतीजे आते गए, बीजेपी समर्थकों ( सॉरी, मोदी समर्थकों) के चेहरे खिलते गए. लोग खुश हैं , क्यूंकि उन्हें उनका नेता मिल गया. वो नेता जिसने कोई कसर नहीं छोड़ी प्रचार में. (हेलीकाप्टर किसका था, वो दूसरा मुद्दा है). गाँव गाँव गली गली गए और 300 कमल मांगे. लोगों ने भी ट्रक भर भर के वोट दिए. चुनाव प्रचार का मैनेजमेंट ऐसा ki उस पे रिसर्च ki जाए तो IIM के सिलेबस को 2 -4 नए चैप्टर मिल जाएँ. फेसबुक, ट्विटर, मोबाइल पे तो लोगों ने "अच्छे दिन" के लिए खुद ki नौकरियां तक न्योछावर कर दी होंगी (जिनके पास थी उन्होंने, इधर तो अभी भी अच्छे दिनों का इंतज़ार है ).

वैसे, ये सब तो इसलिए लिखा क्यूंकि जब तक बैकग्राउंड तैयार न करो, कोई आपके पोलिटिकल ज्ञान को सम्मान नहीं देता. खैर जाने दीजिये, मुख्या मुद्दा है इस चुनाव ki वजह से देश में आई नयी उम्मीद का .
मुझे याद है मैंने ड्राइविंग लाइसेंस बनवाया था 2012 में और मुझमे हिम्मत नहीं थी इमानदारी से 500 रुपये ki कार 5 बार किराये पे लेके बार बार  ट्रायल देने की (जी , बेरोजगार हूँ). एक दलाल ढूंढा और 2000 में बात बनी. घर तक देके गया मेरा लाइसेंस मुझे.

ये तो आसान था. मन तो तब ख़राब होता है जब अखबार में पढता हूँ लोगों ki FIR तक नहीं लिखी जाती बिना "जैक" के. तब एक लड़का सामने आया जिसने कहा ये सिस्टम बदलना होगा.

" बेवकूफ साला. पता नहीं आजकल जिसकी जेब में "पैसा" है लोग पूछते हैं "कैसा" है. कहते हैं "बड़े बाबु" रहे थे कुछ साल पहले ये इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में. फिर क्यूँ नहीं कुछ अच्छा किया देश के लिए?

ओह, बाबु थे. नेता नहीं ! तो अब क्यूँ नेता बनना है इन्हें? देश ki सेवा के लिए? वैसे ही जैसे लालू यादव किये? या जैसे राहुल गाँधी किये? नहीं ? तो फिर कुछ अलग करेंगे? कर लिए! "

खैर  इन्होने प्रचार किया, और दिल्ली विधानसभा में जीत के मुझ जैसे हर उस इंसान को थप्पड़ टिका दिया जो मान चूका था "इस देश का कुछ नहीं होगा". पहली बार उम्मीद जगी ki यार कुछ हो तो सकता है. IIT, IIM, USA के NRIs और भी पता नहीं कौन कौन देश ki बात करने लगा. "सिस्टम बदलना होगा" ये सब के मुह पे था. उम्मीदें चरम पे थी की भाई साहब  इस्तीफा दे दिए. धत्त! हो लिया काम.

फिर भी लोगों ने इन्हें सपोर्ट किया (लोगों ने, मैंने नहीं! ) लेकिन लोकसभा में सिर्फ 4 सीट जीत पाए.

"4 सीट? हाहा! हमें देखो इधर 282 जीते हैं."

सही बात है , 4 सीट ki क्या औकात? बात तो तब होती जब सत्ता मिलती और करोड़ों कूट लेते.वैसे करोड़ों कूटने के लिए 4 MP बहुत ज्यादा होते हैं. लेकिन इधर बात  देश सेवा की थी, इसलिए ही तो परेशानी है. केजरीवाल 3 दिन से ट्विटर से गायब हैं. शायद शर्म आ रही होगी. लेकिन शर्म क्यूँ? क्यूंकि उन्होंने एक मुद्दे को पीछे छोड़ के शायद कुछ गलत रास्ता अपना लिया. ज्यादा बडबोला पन दिखा दिया. लेकिन शर्म क्यूँ ? बात तो देश ki ही कि थी ना. देश ki सेवा में कोशिश की तो इसमें शर्माने का क्या है?

AAP को भले ही 4 सांसद मिले हो, लेकिन इस पार्टी का होना देश के लिए अब ज़रूरी है. केजरीवाल को अपनी कुछ गलतियाँ एक्सेप्ट करके उन्हें सुधारना होगा. AAP जिस चीज़ के लिए गठित हुई थी उसे फिर से जगाना होगा. ध्यान रहे केजरीवाल, लालू यादव न बन जाना !

Sunday, 15 December 2013

ज्योति, हो सके तो.... प्लीज माफ़ कर देना !!!

ज्योति सिंह पांडे!

क्या लिखूं समझ नहीं आ रहा लेकिन अपने आप को रोक भी नही पा रहा हूँ! लड़का हूँ न, शर्म से सर झुका है तुम्हे संबोधित करते हुए. तुम्हे अपनी बहन मान के लिख रहा हूँ. आज पूरा एक साल हो गया ज्योति लेकिन इस एक साल में कुछ नहीं कर पाया मैं. किसी ने तुझे निर्भया कहा, किसी ने दामिनी. सबने बहुत कुछ कहा लेकिन आज भी पिछले एक साल से वही सब हो रहा है, मेरी बहन, तू आज जिंदा होती तो एक डॉक्टर होती. वाइट ब्लेजर और स्टेथोस्कोप होता तेरे पास. समाज में बहुत ऊँचे स्तर का रुतबा होता तेरा. लोग तुझे भगवन मान के तुझसे इलाज करवाने आते. मम्मी-पापा बहुत खुश होते जब तेरे नाम के आगे “डॉ.” लग जाता. शायद तेरे भी कुछ सपने थे, शायद बड़ी गाडी, बहुत बड़ा घर, वर्ल्ड टूर वगरह. जो तूने चाहा था वो तो नहीं हो पाया पूरा .
और तो और हम तो कभी मिले भी नहीं थे. तू जब छोटी रही होगी तब घर में तूने बहुत चंचलता से अपने घर और अपने आस-पास के माहौल को खुशनुमा बनाया होगा.तूने अपने मम्मी पापा और भाई-बहन की छोटी छोटी ख़ुशी का ध्यान रखा होगा. तेरे जन्मदिन पे सबने खुशियाँ भी मनाई होंगी. और आज देख, तुझे एक साल हो गया गए हुए.

कुछ ख़ास तो नहीं बदला मेरी ज़िन्दगी में. लेकिन पापा और मम्मी की ज़िन्दगी में शायद सब कुछ बदल गया है. अब मम्मी तेरे लिए टिफ़िन नहीं बनाती. पापा को तेरी शादी के लिए लड़का नहीं ढूँढना अब. भाइयों के लिए एक बहन क्या होती है शब्दों में नहीं लिखा जा सकता.

ज्योति, तू एक डॉक्टर नही बन पायी लेकिन एक आदर्श बन गयी है! आदर्श हर उस लड़की के लिए जो आज भी ये सब सह रही हैं. मुझे नहीं पता तेरे जाने के बाद इस एक साल में कितनी बच्चियों की मासुमता को कुचल दिया गया लेकिन बंद नहीं हुआ ये सब.

मैं तेरा सगा भाई तो नहीं हूँ, लेकिन एक बहन मेरे भी है. समझता हूँ की एक लड़की परिवार में क्या होती है. ज़िन्दगी में एक लड़की की क्या भूमिका है. सिर्फ माँ-पापा ने ही एक लड़की को नहीं खोया है बल्कि इस देश ने एक होनहार डॉक्टर, और एक जिंदादिल ज़िन्दगी को खो दिया. पिछले एक साल में बहुत ड्रामा हुआ है. हर इंसान के मन में गुसा है, लेकिन आज भी वही सब इन्टरनेट और बॉलीवुड का गन्दा खेल चल रहा है. मैं और पूरा देश उस दिन भी दुखी थे, आज भी दुखी हैं. फर्क इतना है की पिछले साल कम से कम कुछ लोगों ने नए साले पे ख़ुशी नहीं मनाई थी, इस साल शायद मम्मी-पापा के अलावा सब हनी सिंह के गानों पे पूरी रात नाच नाच के नए साल का स्वागत करेंगे.

तेरे गुनाहगार आज भी जिंदा हैं ज्योति लेकिन उन्हें जल्द ही सजा मिलेगी ऐसा मुझे यकीन है. मैं उन्हें तड़पते हुए देखना चाहता हूँ. उनकी आँखों से खून निकलते हुए और उन्हें अपने जन्म पे पछताते हुए. कोई उन्हें भले माफ़ कर दे, लेकिन एक भाई होने के नाते मैं नहीं कर सकता!

ज्योति, मैं शर्मिंदा हूँ मेरी बहन! तूने मुझे इस जन्म में तो राखी नहीं बाँधी थी.  लेकिन एक दुआ है ऊपर वाले से की तेरा अगला जन्म मेरे घर में हो! मेरी बहन या मेरी बेटी के तौर पे! वादा है मेरा, पूरी जान लगा के भी तुझे एक राजकुमारी की तरह रखूँगा! एक ऐसी राजकुमारी जिसके प्रति सबके मन में सम्मान हो! और एक ऐसे माहौल में जिसमे लोगों को बच्चियों में “cuteness” नज़र आये, उनका शरीर नहीं!

और नहीं लिख पाउँगा ज्योति, हो सके तो.... प्लीज माफ़ कर देना !!!


- तेरा एक भाई!

Thursday, 24 October 2013

बुरे फंसे बुढ़ापे में!

मेरे दिल में इस इंसान के लिए शुरू से सम्मान था और रहेगा, लेकिन आज की बात करें तो इस समय देश के सबसे ज्यादा काम आये  अब तक के सर्वश्रेष्ठ अर्थशास्त्री डॉक्टर मनमोहन सिंह आज अपने ही घर में एक बिसरा दी गयी मूर्ति जैसे हो गए हैं. हालाँकि अभी तक उनके नाम के आगे सभी लोग "प्रधानमंत्री" और पीछे "जी" लगा रहे हैं लेकिन ये सब अब एक औपचारिकता की तरह है.
1991 की बात है जब देश में भयंकर आर्थिक संकट था, तब एक गबरू जवान ने सामने आके देश में कुछ जी सकने लायक माहौल बनाया. ये वही इंसान थे जो परदे के पीछे से देश के लिए काम करते रहे. साल 2004 में जब सोनिया जी ने अपने आप में एक बहुत बड़ा त्याग किया तो यही वो नाम था जो बिना किसी वाद-विवाद के सबने स्वीकार किया. मनमोहन सिंह को जब से प्रधान मंत्री बनाया गया है तब से उनसे एक चमत्कार की उम्मीद की गयी है और मुझे सच में नहीं पता की उन्होंने कोई चमत्कार किया है या नहीं. मुझे नहीं पता देश में वास्तविक तौर पे गरीबी कम हुई है या नहीं , देश में महंगाई कम हुई है या बढ़ी है वगैरह वगैरह लेकिन इतना यकीन है की मनमोहन सिंह उन लोगों में से हैं जिनको मैं इमानदारी के मामले में 10 में से 10 दे सकता हूँ.
मनमोहन सिंह भले ही ईमानदार हों, लेकिन उनकी एक बात जो मुझे हमेशा अखरती है वो है उनका ढुलमुल रवैया. हाँ वही रवैया जिससे साबित होता है की दिल्ली में बलात्कार होते रहें, देश की सीमा पे सैनिकों का अपमान होता रहे लेकिन दिल्ली की कुर्सी पे बैठे लोग अपना मुह नहीं खोलेंगे. और खोलेंगे भी तो बिलकुल आखिरी पड़ाव पे आके. 9 दिन लिए ज्योति सिंह पाण्डे के साथ हुए अन्याय पे मुह खोलने में, और सैनिकों की तो मौत पे मुह तक नहीं खोला इन्होने. खैर इस समय ये इंसान खुद इतना बेचारा बना हुआ है की तरस के अलावा कुछ नहीं है मेरे पास इन के लिए.
तरस क्यूँ? अरे भाई साहब जब कल के एक लड़के ने देश को इतना कुछ दे सके इंसान की सरे राह इतनी बुरी बेईज्ज़ती की तभी दिल से एक आह निकली, की नहीं यार मैंने कुछ गलत सुना है. मनमोहन सिंह जी के बारे में कम से कम कोई समझदार इंसान इस तरह के शब्द राष्ट्रीय स्तर पे नहीं बोल सकता. लेकिन नहीं जनाब हम गलत थे, कांग्रेस के ही उपाध्यक्ष ने उनका अपमान कर डाला था . मैं भले ही राजनैतिक तौर पर इस समय कांग्रेस से थोडा नाराज़ हूँ लेकिन एक बात तय है की कांग्रेस ने अपने सबसे इमानदार और देश के प्रति जवाबदेह इंसान को आज भुला दिया है. मेरी उम्र छोटी है लेकिन इतना जनता हूँ की सम्मान के हक़दार का सम्मान न हो तो कुछ गड़बड़ है.
यहाँ तक भी सब कुछ ठीकठाक था, लेकिन तभी पाकिस्तान की तरफ से खबर आई की उन्होंने मनमोहन सिंह जी को कुछ गलत शब्द बोले हैं. हालाँकि मुझे पता नहीं उन्होंने सच में ऐसा बोला या नहीं लेकिन फिर भी 125 करोड़ लोगों के नेतृत्व का अपमान करना सही नहीं है.
मनमोहन सिंह के प्रति मेरा सम्मान और मेरा प्यार कम इसलिए भी नहीं होता की देश के काम आने के साथ साथ वे अपनी पार्टी के लिए भी हमेशा वफादार रहे हैं . जिस को कांग्रेस प्रधानमंत्री बना रही है उस ने बचपने में भले ही उनका अपमान किया हो लेकिन मनमोहन सिंह ने कभी कुछ उल्टा जवाब नहीं दिया. वे आज तक कांग्रेस और राहुल को बचा ही रहे हैं.
आज एक नया ही केस जुदा है उनसे, कोयले का . सीबीआई भी पुछ्ताछ करेगी शायद उनसे, जिसके लिए उन्होंने खुद को तैयार भी बताया है. लेकिन जो भी है , आज कांग्रेस ने जो अच्छा किया है उसका श्रेय अध्यक्ष जी और उपाध्यक्ष जी  लेना चाहते हैं, लेकिन जो कुछ भी गलत हुआ है उसका ठीकरा बेचारे सरदारजी पर ???

Monday, 2 September 2013

वर्ल्ड क्लास और थर्ड क्लास?

अमेरिका बनोगे? वर्ल्ड-क्लास कंट्री बनेगा इंडिया? आज अमेरिका विश्व शक्ति है तो यूँ ही नहीं है. सामने से टीम को लीड करने वाला लीडर होता है , न की मज़बूरी और संसाधनों के लिए रोने वाला. दंतेवाडा में 76 मरे, एक शब्द सहानुभूति का नहीं निकला मेरे देश के सिपहसालारों के. दिल्ली में देश की इज्ज़त लुट गयी 16 दिसम्बर को 8 दिन लगा दिए एक राटा रटाया भाषण देने में. देश के राष्ट्रपति के सामने जनता रीझ के मर गयी, साहब बाहर आने की हिम्मत नहीं जूटा पाए. एक लड़की के रूप में देश ने अपना सम्मान खो दिया लेकिन मजाल है कोई एक शब्द कह दे जो इस निराशा में कोई छोटी सी भी उम्मीद दिखा देता ?
1947 में आजाद हुए थे, उसके बाद सब ठीक था. फिर धीरे धीरे हम पिछड़ते गए. अमेरिका , जो कभी हमारे बराबर का सा होता दिख रहा था वो बहुत आगे निकल गया. आप जानते हैं हमारे देश की GDP कितनी है? मैं बता देता हूँ लगभग 1180 अरब डॉलर. हाँ बहुत बड़ी रकम है. इतनी बड़ी की आप और मैं तो शायद एक जनम में गिन भी न पायें. लेकिन इसमें खुश होने का क्या है?
 दुनिया की  2.42 % ज़मीन है हमारे पास, 17.5 % जनसँख्या है फिर हम क्यूँ एक पप्पू देश बने हुए हैं? नौकरियां है नहीं, ज़िन्दगी की कोई कीमत है नहीं, इलाज है नहीं, खाना है नहीं, पानी है नहीं , है क्या इस देश में? "मेरा भारत महान" बोलो , मैं भी बोलता हूँ तुम भी बोलो और बन जायेंगे हम बड़े. मन लो 15 अगस्त हर साल आज़ाद हैं आज़ाद हैं, फिर क्यूँ गुलामी सा लगता है?
जिस आजाद देश की आज़ादी के दिन भाषण देने वाला ही बुलेट प्रूफ कांच के बक्से में से बोलता है वो क्या आजाद है? बोलते हैं ये किया वो किया 66 साल में? क्या किया? 82 करोड़ लोगों की थाली में तो रोटी नहीं दे पाए जो अब चुनाव के टाइम झुनझुना दे रहे हो? जिस चीज़ पे दुःख होना चाहिए की 66 साल में केवल 37 लोगों को रोटी मिली उस चीज़ पे सीना ठोक रहे हैं की हमने ये किया वो किया.
कोई बोलता है खड़ा होके, 21वीं सदी भारत की होगी, ये होगा वो होगा, क्या होगा? क्या हुआ? लोग मरना बंद हो गए? जैसे हम देखता हैं बांग्लादेश को वैसे पूरा विश्व देखता है हमें, लूटा पीटा देश. क्यूँ?




अमेरिका में होता है 14 दिसम्बर 2012 को एक हमला एक स्कूल में , शाम को देश के सामने आके राष्ट्रपति दुःख व्यक्त करता है, उम्मीद बंधाता है देश को की "चिंता मत करो मैं हूँ". वो भाषण पढ़ते पढ़ते उसकी आँखों में आंसू आजाते हैं , जिससे साफ़ दिल को महसूस होता है है की कोई है हमारे दुःख में शामिल. दिखावा नहीं है वो. विडियो दिया है उस भाषण का. यहाँ दूरदर्शन पे ठीक है जैसे रेट रटाये भाषण दिए जा रहे हैं! शर्म आनी चाहिये मुझे और आपको जो हम इनके भरोसे बैठे हैं. और छोडो  "नाबालिग " है बोल के छोड़ दिया की जा बीटा कर और बलात्कार, माफ़ करना सरकार, अच्छे से तो छोडिये, बुरे से बुरे शासक भी आपके सामने शरमा जायेंगे!
ठोको सारे मिलके छाती की मेरी पार्टी ने ये किया मेरी पार्टी ने ये किया. जीते रहो यही जानवरों वाली ज़िन्दगी.करते रहो देश को इगनोर. हमें क्या मतलब? बने रहो शतुरमुर्ग क्या होगा?