नतीजे सामने हैं और नया प्रधान मंत्री भी. माननीय नरेन्द्र मोदी जी को इस सफलता की बधाई. देश में बहुत सालों बाद बहुत बड़ा जनादेश और एक सुर का जनादेश सच में सुन के अच्छा ही लगा.
नतीजे आते गए, बीजेपी समर्थकों ( सॉरी, मोदी समर्थकों) के चेहरे खिलते गए. लोग खुश हैं , क्यूंकि उन्हें उनका नेता मिल गया. वो नेता जिसने कोई कसर नहीं छोड़ी प्रचार में. (हेलीकाप्टर किसका था, वो दूसरा मुद्दा है). गाँव गाँव गली गली गए और 300 कमल मांगे. लोगों ने भी ट्रक भर भर के वोट दिए. चुनाव प्रचार का मैनेजमेंट ऐसा ki उस पे रिसर्च ki जाए तो IIM के सिलेबस को 2 -4 नए चैप्टर मिल जाएँ. फेसबुक, ट्विटर, मोबाइल पे तो लोगों ने "अच्छे दिन" के लिए खुद ki नौकरियां तक न्योछावर कर दी होंगी (जिनके पास थी उन्होंने, इधर तो अभी भी अच्छे दिनों का इंतज़ार है ).
वैसे, ये सब तो इसलिए लिखा क्यूंकि जब तक बैकग्राउंड तैयार न करो, कोई आपके पोलिटिकल ज्ञान को सम्मान नहीं देता. खैर जाने दीजिये, मुख्या मुद्दा है इस चुनाव ki वजह से देश में आई नयी उम्मीद का .
मुझे याद है मैंने ड्राइविंग लाइसेंस बनवाया था 2012 में और मुझमे हिम्मत नहीं थी इमानदारी से 500 रुपये ki कार 5 बार किराये पे लेके बार बार ट्रायल देने की (जी , बेरोजगार हूँ). एक दलाल ढूंढा और 2000 में बात बनी. घर तक देके गया मेरा लाइसेंस मुझे.
ये तो आसान था. मन तो तब ख़राब होता है जब अखबार में पढता हूँ लोगों ki FIR तक नहीं लिखी जाती बिना "जैक" के. तब एक लड़का सामने आया जिसने कहा ये सिस्टम बदलना होगा.
" बेवकूफ साला. पता नहीं आजकल जिसकी जेब में "पैसा" है लोग पूछते हैं "कैसा" है. कहते हैं "बड़े बाबु" रहे थे कुछ साल पहले ये इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में. फिर क्यूँ नहीं कुछ अच्छा किया देश के लिए?
ओह, बाबु थे. नेता नहीं ! तो अब क्यूँ नेता बनना है इन्हें? देश ki सेवा के लिए? वैसे ही जैसे लालू यादव किये? या जैसे राहुल गाँधी किये? नहीं ? तो फिर कुछ अलग करेंगे? कर लिए! "
खैर इन्होने प्रचार किया, और दिल्ली विधानसभा में जीत के मुझ जैसे हर उस इंसान को थप्पड़ टिका दिया जो मान चूका था "इस देश का कुछ नहीं होगा". पहली बार उम्मीद जगी ki यार कुछ हो तो सकता है. IIT, IIM, USA के NRIs और भी पता नहीं कौन कौन देश ki बात करने लगा. "सिस्टम बदलना होगा" ये सब के मुह पे था. उम्मीदें चरम पे थी की भाई साहब इस्तीफा दे दिए. धत्त! हो लिया काम.
फिर भी लोगों ने इन्हें सपोर्ट किया (लोगों ने, मैंने नहीं! ) लेकिन लोकसभा में सिर्फ 4 सीट जीत पाए.
"4 सीट? हाहा! हमें देखो इधर 282 जीते हैं."
सही बात है , 4 सीट ki क्या औकात? बात तो तब होती जब सत्ता मिलती और करोड़ों कूट लेते.वैसे करोड़ों कूटने के लिए 4 MP बहुत ज्यादा होते हैं. लेकिन इधर बात देश सेवा की थी, इसलिए ही तो परेशानी है. केजरीवाल 3 दिन से ट्विटर से गायब हैं. शायद शर्म आ रही होगी. लेकिन शर्म क्यूँ? क्यूंकि उन्होंने एक मुद्दे को पीछे छोड़ के शायद कुछ गलत रास्ता अपना लिया. ज्यादा बडबोला पन दिखा दिया. लेकिन शर्म क्यूँ ? बात तो देश ki ही कि थी ना. देश ki सेवा में कोशिश की तो इसमें शर्माने का क्या है?
AAP को भले ही 4 सांसद मिले हो, लेकिन इस पार्टी का होना देश के लिए अब ज़रूरी है. केजरीवाल को अपनी कुछ गलतियाँ एक्सेप्ट करके उन्हें सुधारना होगा. AAP जिस चीज़ के लिए गठित हुई थी उसे फिर से जगाना होगा. ध्यान रहे केजरीवाल, लालू यादव न बन जाना !
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