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Sunday, 15 December 2013

ज्योति, हो सके तो.... प्लीज माफ़ कर देना !!!

ज्योति सिंह पांडे!

क्या लिखूं समझ नहीं आ रहा लेकिन अपने आप को रोक भी नही पा रहा हूँ! लड़का हूँ न, शर्म से सर झुका है तुम्हे संबोधित करते हुए. तुम्हे अपनी बहन मान के लिख रहा हूँ. आज पूरा एक साल हो गया ज्योति लेकिन इस एक साल में कुछ नहीं कर पाया मैं. किसी ने तुझे निर्भया कहा, किसी ने दामिनी. सबने बहुत कुछ कहा लेकिन आज भी पिछले एक साल से वही सब हो रहा है, मेरी बहन, तू आज जिंदा होती तो एक डॉक्टर होती. वाइट ब्लेजर और स्टेथोस्कोप होता तेरे पास. समाज में बहुत ऊँचे स्तर का रुतबा होता तेरा. लोग तुझे भगवन मान के तुझसे इलाज करवाने आते. मम्मी-पापा बहुत खुश होते जब तेरे नाम के आगे “डॉ.” लग जाता. शायद तेरे भी कुछ सपने थे, शायद बड़ी गाडी, बहुत बड़ा घर, वर्ल्ड टूर वगरह. जो तूने चाहा था वो तो नहीं हो पाया पूरा .
और तो और हम तो कभी मिले भी नहीं थे. तू जब छोटी रही होगी तब घर में तूने बहुत चंचलता से अपने घर और अपने आस-पास के माहौल को खुशनुमा बनाया होगा.तूने अपने मम्मी पापा और भाई-बहन की छोटी छोटी ख़ुशी का ध्यान रखा होगा. तेरे जन्मदिन पे सबने खुशियाँ भी मनाई होंगी. और आज देख, तुझे एक साल हो गया गए हुए.

कुछ ख़ास तो नहीं बदला मेरी ज़िन्दगी में. लेकिन पापा और मम्मी की ज़िन्दगी में शायद सब कुछ बदल गया है. अब मम्मी तेरे लिए टिफ़िन नहीं बनाती. पापा को तेरी शादी के लिए लड़का नहीं ढूँढना अब. भाइयों के लिए एक बहन क्या होती है शब्दों में नहीं लिखा जा सकता.

ज्योति, तू एक डॉक्टर नही बन पायी लेकिन एक आदर्श बन गयी है! आदर्श हर उस लड़की के लिए जो आज भी ये सब सह रही हैं. मुझे नहीं पता तेरे जाने के बाद इस एक साल में कितनी बच्चियों की मासुमता को कुचल दिया गया लेकिन बंद नहीं हुआ ये सब.

मैं तेरा सगा भाई तो नहीं हूँ, लेकिन एक बहन मेरे भी है. समझता हूँ की एक लड़की परिवार में क्या होती है. ज़िन्दगी में एक लड़की की क्या भूमिका है. सिर्फ माँ-पापा ने ही एक लड़की को नहीं खोया है बल्कि इस देश ने एक होनहार डॉक्टर, और एक जिंदादिल ज़िन्दगी को खो दिया. पिछले एक साल में बहुत ड्रामा हुआ है. हर इंसान के मन में गुसा है, लेकिन आज भी वही सब इन्टरनेट और बॉलीवुड का गन्दा खेल चल रहा है. मैं और पूरा देश उस दिन भी दुखी थे, आज भी दुखी हैं. फर्क इतना है की पिछले साल कम से कम कुछ लोगों ने नए साले पे ख़ुशी नहीं मनाई थी, इस साल शायद मम्मी-पापा के अलावा सब हनी सिंह के गानों पे पूरी रात नाच नाच के नए साल का स्वागत करेंगे.

तेरे गुनाहगार आज भी जिंदा हैं ज्योति लेकिन उन्हें जल्द ही सजा मिलेगी ऐसा मुझे यकीन है. मैं उन्हें तड़पते हुए देखना चाहता हूँ. उनकी आँखों से खून निकलते हुए और उन्हें अपने जन्म पे पछताते हुए. कोई उन्हें भले माफ़ कर दे, लेकिन एक भाई होने के नाते मैं नहीं कर सकता!

ज्योति, मैं शर्मिंदा हूँ मेरी बहन! तूने मुझे इस जन्म में तो राखी नहीं बाँधी थी.  लेकिन एक दुआ है ऊपर वाले से की तेरा अगला जन्म मेरे घर में हो! मेरी बहन या मेरी बेटी के तौर पे! वादा है मेरा, पूरी जान लगा के भी तुझे एक राजकुमारी की तरह रखूँगा! एक ऐसी राजकुमारी जिसके प्रति सबके मन में सम्मान हो! और एक ऐसे माहौल में जिसमे लोगों को बच्चियों में “cuteness” नज़र आये, उनका शरीर नहीं!

और नहीं लिख पाउँगा ज्योति, हो सके तो.... प्लीज माफ़ कर देना !!!


- तेरा एक भाई!

Thursday, 24 October 2013

बुरे फंसे बुढ़ापे में!

मेरे दिल में इस इंसान के लिए शुरू से सम्मान था और रहेगा, लेकिन आज की बात करें तो इस समय देश के सबसे ज्यादा काम आये  अब तक के सर्वश्रेष्ठ अर्थशास्त्री डॉक्टर मनमोहन सिंह आज अपने ही घर में एक बिसरा दी गयी मूर्ति जैसे हो गए हैं. हालाँकि अभी तक उनके नाम के आगे सभी लोग "प्रधानमंत्री" और पीछे "जी" लगा रहे हैं लेकिन ये सब अब एक औपचारिकता की तरह है.
1991 की बात है जब देश में भयंकर आर्थिक संकट था, तब एक गबरू जवान ने सामने आके देश में कुछ जी सकने लायक माहौल बनाया. ये वही इंसान थे जो परदे के पीछे से देश के लिए काम करते रहे. साल 2004 में जब सोनिया जी ने अपने आप में एक बहुत बड़ा त्याग किया तो यही वो नाम था जो बिना किसी वाद-विवाद के सबने स्वीकार किया. मनमोहन सिंह को जब से प्रधान मंत्री बनाया गया है तब से उनसे एक चमत्कार की उम्मीद की गयी है और मुझे सच में नहीं पता की उन्होंने कोई चमत्कार किया है या नहीं. मुझे नहीं पता देश में वास्तविक तौर पे गरीबी कम हुई है या नहीं , देश में महंगाई कम हुई है या बढ़ी है वगैरह वगैरह लेकिन इतना यकीन है की मनमोहन सिंह उन लोगों में से हैं जिनको मैं इमानदारी के मामले में 10 में से 10 दे सकता हूँ.
मनमोहन सिंह भले ही ईमानदार हों, लेकिन उनकी एक बात जो मुझे हमेशा अखरती है वो है उनका ढुलमुल रवैया. हाँ वही रवैया जिससे साबित होता है की दिल्ली में बलात्कार होते रहें, देश की सीमा पे सैनिकों का अपमान होता रहे लेकिन दिल्ली की कुर्सी पे बैठे लोग अपना मुह नहीं खोलेंगे. और खोलेंगे भी तो बिलकुल आखिरी पड़ाव पे आके. 9 दिन लिए ज्योति सिंह पाण्डे के साथ हुए अन्याय पे मुह खोलने में, और सैनिकों की तो मौत पे मुह तक नहीं खोला इन्होने. खैर इस समय ये इंसान खुद इतना बेचारा बना हुआ है की तरस के अलावा कुछ नहीं है मेरे पास इन के लिए.
तरस क्यूँ? अरे भाई साहब जब कल के एक लड़के ने देश को इतना कुछ दे सके इंसान की सरे राह इतनी बुरी बेईज्ज़ती की तभी दिल से एक आह निकली, की नहीं यार मैंने कुछ गलत सुना है. मनमोहन सिंह जी के बारे में कम से कम कोई समझदार इंसान इस तरह के शब्द राष्ट्रीय स्तर पे नहीं बोल सकता. लेकिन नहीं जनाब हम गलत थे, कांग्रेस के ही उपाध्यक्ष ने उनका अपमान कर डाला था . मैं भले ही राजनैतिक तौर पर इस समय कांग्रेस से थोडा नाराज़ हूँ लेकिन एक बात तय है की कांग्रेस ने अपने सबसे इमानदार और देश के प्रति जवाबदेह इंसान को आज भुला दिया है. मेरी उम्र छोटी है लेकिन इतना जनता हूँ की सम्मान के हक़दार का सम्मान न हो तो कुछ गड़बड़ है.
यहाँ तक भी सब कुछ ठीकठाक था, लेकिन तभी पाकिस्तान की तरफ से खबर आई की उन्होंने मनमोहन सिंह जी को कुछ गलत शब्द बोले हैं. हालाँकि मुझे पता नहीं उन्होंने सच में ऐसा बोला या नहीं लेकिन फिर भी 125 करोड़ लोगों के नेतृत्व का अपमान करना सही नहीं है.
मनमोहन सिंह के प्रति मेरा सम्मान और मेरा प्यार कम इसलिए भी नहीं होता की देश के काम आने के साथ साथ वे अपनी पार्टी के लिए भी हमेशा वफादार रहे हैं . जिस को कांग्रेस प्रधानमंत्री बना रही है उस ने बचपने में भले ही उनका अपमान किया हो लेकिन मनमोहन सिंह ने कभी कुछ उल्टा जवाब नहीं दिया. वे आज तक कांग्रेस और राहुल को बचा ही रहे हैं.
आज एक नया ही केस जुदा है उनसे, कोयले का . सीबीआई भी पुछ्ताछ करेगी शायद उनसे, जिसके लिए उन्होंने खुद को तैयार भी बताया है. लेकिन जो भी है , आज कांग्रेस ने जो अच्छा किया है उसका श्रेय अध्यक्ष जी और उपाध्यक्ष जी  लेना चाहते हैं, लेकिन जो कुछ भी गलत हुआ है उसका ठीकरा बेचारे सरदारजी पर ???

Monday, 2 September 2013

वर्ल्ड क्लास और थर्ड क्लास?

अमेरिका बनोगे? वर्ल्ड-क्लास कंट्री बनेगा इंडिया? आज अमेरिका विश्व शक्ति है तो यूँ ही नहीं है. सामने से टीम को लीड करने वाला लीडर होता है , न की मज़बूरी और संसाधनों के लिए रोने वाला. दंतेवाडा में 76 मरे, एक शब्द सहानुभूति का नहीं निकला मेरे देश के सिपहसालारों के. दिल्ली में देश की इज्ज़त लुट गयी 16 दिसम्बर को 8 दिन लगा दिए एक राटा रटाया भाषण देने में. देश के राष्ट्रपति के सामने जनता रीझ के मर गयी, साहब बाहर आने की हिम्मत नहीं जूटा पाए. एक लड़की के रूप में देश ने अपना सम्मान खो दिया लेकिन मजाल है कोई एक शब्द कह दे जो इस निराशा में कोई छोटी सी भी उम्मीद दिखा देता ?
1947 में आजाद हुए थे, उसके बाद सब ठीक था. फिर धीरे धीरे हम पिछड़ते गए. अमेरिका , जो कभी हमारे बराबर का सा होता दिख रहा था वो बहुत आगे निकल गया. आप जानते हैं हमारे देश की GDP कितनी है? मैं बता देता हूँ लगभग 1180 अरब डॉलर. हाँ बहुत बड़ी रकम है. इतनी बड़ी की आप और मैं तो शायद एक जनम में गिन भी न पायें. लेकिन इसमें खुश होने का क्या है?
 दुनिया की  2.42 % ज़मीन है हमारे पास, 17.5 % जनसँख्या है फिर हम क्यूँ एक पप्पू देश बने हुए हैं? नौकरियां है नहीं, ज़िन्दगी की कोई कीमत है नहीं, इलाज है नहीं, खाना है नहीं, पानी है नहीं , है क्या इस देश में? "मेरा भारत महान" बोलो , मैं भी बोलता हूँ तुम भी बोलो और बन जायेंगे हम बड़े. मन लो 15 अगस्त हर साल आज़ाद हैं आज़ाद हैं, फिर क्यूँ गुलामी सा लगता है?
जिस आजाद देश की आज़ादी के दिन भाषण देने वाला ही बुलेट प्रूफ कांच के बक्से में से बोलता है वो क्या आजाद है? बोलते हैं ये किया वो किया 66 साल में? क्या किया? 82 करोड़ लोगों की थाली में तो रोटी नहीं दे पाए जो अब चुनाव के टाइम झुनझुना दे रहे हो? जिस चीज़ पे दुःख होना चाहिए की 66 साल में केवल 37 लोगों को रोटी मिली उस चीज़ पे सीना ठोक रहे हैं की हमने ये किया वो किया.
कोई बोलता है खड़ा होके, 21वीं सदी भारत की होगी, ये होगा वो होगा, क्या होगा? क्या हुआ? लोग मरना बंद हो गए? जैसे हम देखता हैं बांग्लादेश को वैसे पूरा विश्व देखता है हमें, लूटा पीटा देश. क्यूँ?




अमेरिका में होता है 14 दिसम्बर 2012 को एक हमला एक स्कूल में , शाम को देश के सामने आके राष्ट्रपति दुःख व्यक्त करता है, उम्मीद बंधाता है देश को की "चिंता मत करो मैं हूँ". वो भाषण पढ़ते पढ़ते उसकी आँखों में आंसू आजाते हैं , जिससे साफ़ दिल को महसूस होता है है की कोई है हमारे दुःख में शामिल. दिखावा नहीं है वो. विडियो दिया है उस भाषण का. यहाँ दूरदर्शन पे ठीक है जैसे रेट रटाये भाषण दिए जा रहे हैं! शर्म आनी चाहिये मुझे और आपको जो हम इनके भरोसे बैठे हैं. और छोडो  "नाबालिग " है बोल के छोड़ दिया की जा बीटा कर और बलात्कार, माफ़ करना सरकार, अच्छे से तो छोडिये, बुरे से बुरे शासक भी आपके सामने शरमा जायेंगे!
ठोको सारे मिलके छाती की मेरी पार्टी ने ये किया मेरी पार्टी ने ये किया. जीते रहो यही जानवरों वाली ज़िन्दगी.करते रहो देश को इगनोर. हमें क्या मतलब? बने रहो शतुरमुर्ग क्या होगा?

Wednesday, 21 August 2013

ताकतवर बनना है, हैवान नहीं .......

ज़िन्दगी में एक सबक सबने सुना होगा और याद भी रखा होगा, जिसकी लाठी उसकी भैंस! यानि की जिसके पास शक्ति, बात उसी की मानी जाएगी. मैं इस चीज़ में ज्यादा विश्वास नहीं करता, (शायद मेरी कद-काठी की वजह से),लेकिन इतना तय है की इस बात ने बहुत कुछ गड़बड़ कर दिया.youtube के पन्नो को पलटते हुए, 1992 के बाबरी मस्जिद विध्वंस के बारे में जुड़े कुछ विडियो देखे और यकीन मानो, एक हिन्दू होने की जो अनुभूति थी मन में, वो जाती रही!
दोस्तों, ये जाती पाती धर्म, अधर्म, ये सब मुझे नहीं पता किसने बनाये हैं और न ही ये पता है की इन सब को मानने नहीं मानने से होता क्या है, लेकिन इतना जनता हूँ जब किसी को धर्म के नाम पे जिंदा जलाया जाता होगा तो दर्द बहुत होता होगा. क्या कर सकते हैं, इंसान की चमड़ी है, कोई चाइना का खिलौना नहीं जो सस्ते में वापिस मिल जायेगा. जितनी उम्र नहीं है उससे ज्यादा तो दंगे देखे हैं (असल में सुने हैं) हम लोगों ने. क्या मिलता है इन दंगो से? लोगों के घर जल जाते हैं, महिलाओं से बलात्कार, घर के छोटे छोटे बच्चो को मार देना और भी न जाने क्या क्या? लेकिन फायदा किसका? शायद दंगो के बाद के राहत कोष को सँभालने वालों का? या फिर धर्म की बात करने वाले पंडितों,मौलवियों का?
सबसे पहले जो दंगे के बारे में सुना वो था 2002 का गुजरात दंगा. कुछ ने कहा हिन्दुओं ने मारा, कुछ ने कहा मुस्लमान ने मारा लेकिन सच तो ये है , की इंसान ने इंसान को मारा ! और सबसे दुःख की बात, कोई अपने आप को दोषी नहीं मानेगा. हत्या, बलात्कार, जिंदा जलाना ये सब ने बहुत दुखी किया. उसके बाद ज्यों ज्यों पढना शुरू किया सामने आया मुंबई 1993 का दंगा. उसमे भी सेम चीज़ थी. इंसान ने इंसान को मारा और फिर शुरू हुई राजनीती. बाल ठाकरे विरुद्ध मुसलमानों की राजनीती शुरू हुई, लेकिन इन सब से ऊपर एक बात सामने आती है वो है, लाल रंग का खून अब लाल रंग का पानी बन चूका है.
1984 में सिखों का कत्ले आम हुआ और अभी थोड़ी देर पहले अर्नब जी के न्यूज़ ऑवर शो में Jagdish Tytler की डिबेट उस मुद्दे पे मैंने सुनी, सिर्फ इतना कहा जा सकता है की जिस देश में इंसानियत के पाठ सिखाये जाते हों, वहां ऐसे काण्ड होने के बाद भी सब अपने आप को बचाने में लगे हैं.
“ताकतवर था इसलिए मैंने राज किया अच्छे से, अच्छे से राज किया इसलिए ताकतवर नहीं था” ये है आज की सच्चाई. मुस्लमान इंसान है और हिन्दू भी इंसान है. दोनों के खून का रंग लाल है, दोनों की शारीरिक रचना एक है लेकिन बदकिस्मती की लोगों की सोच एक नहीं है. भारत में ऐसे बहुत से किस्से हैं, जिनमे गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाले दी जाती हैं. ज्यादा दूर नहीं जाऊंगा, मेरे शहर में एक मंदिर है हनुमान जी का बड़ा सा, और उस मंदिर के अन्दर जाने के रस्ते के बिलकुल नज़दीक से एक मस्जिद का रास्ता है, और देखा जाये दूर से तो वो मस्जिद ऊँचाई पे स्थित है, यानि की दूर से लगता है मंदिर के ऊपर ही बनी है. जिस देश का अब तक का सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रपति मुस्लमान रहा हो, और जिस देश में मुस्लिम रक्षाबंधन के त्यौहार को अपना समझ के मनाते हों, उस देश में इस भेदभाव का क्या काम? सोहार्द्र और शांति के लिए क्या हम हमारे धर्मों के झूठे ढोंग को पीछे नहीं छोड़ सकते? याद रखना, हिन्दुओं का सबसे बड़ा त्यौहार “दिवाली” “अली” के बिना अधुरा है और मुसलमानों का सबसे बड़ा त्यौहार ईद देने वाला “रमजान” का महिना “राम” के बिना अधुरा है! हम सब एक हैं.................अलग नहीं!


Thursday, 8 August 2013

15 अगस्त से पहले....




जिस देश का पडोसी पाकिस्तान जैसा होता है उस देश के लिए सेना उतनी ही ज़रूरी है जितनी की मोबाइल के लिए बैलेंस. अगर बैलेंस न हो तो आप किसी को मुसीबत के समय  याद नहीं कर सकते ठीक उसी तरह देश के पास सेना न हो तो वो मुसीबत की घडी में किसी को याद नहीं कर सकता. सेना एक छोटा सा शब्द ज़रूर है , लेकिन इसका मतलब होता है एक ऐसा ग्रुप जो आपको पाकिस्तान और चाइना जैसों से बचाए, एक ऐसा ग्रुप जो आपको बाढ़ के समय आपके घर तक पहुंचाए , एक ऐसा ग्रुप जिसे साल में 10 छुट्टी भले न मिले लेकिन उसको मिलने वाले पेट्रोल पंप तक चोरी हो रहे हैं.
पाकिस्तान ने अभी जो किया वो उसकी फितरत रही है, और शर्तिया आगे भी रहेगी लेकिन गलती मेरे ही देश की तरफ से हो रही है. एक तरफ ईद का पवित्र त्यौहार है और दूसरी तरफ इन पांच जवानों के घर में पसरा मातम. किसे अपने बच्चे से साइकिल का वादा किया था तो कोई अपनी बेटी को डॉक्टर बनाना चाहता था लेकिन अब सब शांत हो चूका है. ताबूत की आखिरी कील, भीम सिंह जैसे लोगों के बयान की फौजी होते ही मरने के लिए हैं. मनमोहन सिंह जी से तो कब की आस टूट चुकी है, अब उम्मीद करे तो किससे. बचपन से एक ख्वाब था और आज भी है, की जब मरुँ तो इंडियन आर्मी के ट्रक से लाश घर पहुंचे . मुझे आर्मी से लगाव है या नहीं ये फर्क नहीं डालता इस बात पे की इंडियन आर्मी से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ नहीं है आज के भारत में. मुझे ये नही पता की भारत का शीर्ष प्रबंधन बदलने से कुछ फरक पड़ेगा लेकिन एक बात तय है की भारत खतरे में है. और खतरा है वो रक्षा मंत्री जो पाकिस्तान को शाह देता है , वो सांसद जो कहता है हमारे जवान भी उन्हें मारते रहते हैं कोई बड़ी बात नहीं है, और सबसे बड़े वो जो समझते हैं की आर्मी में इंसान नहीं जानवर हैं. सरकार कुछ नहीं करेगी या कहूँ कुछ नहीं कर सकती, हमें ही कुछ करना होगा कम से कम  दो मिनट के लिए अपनी आँखे ही  नाम कर लो इन सैनिकों के लिए 15 अगस्त से पहले.........

Tuesday, 6 August 2013

ज़रूरत है अब मुह तोड़ने की

5 जवान शहीद हो गए हैं फिर से हमारी ही सीमा में घुसे पाकिस्तानियों की गोलियों से. 20 लोगों ने घेर के मारा है 5 लोगों को. समझ नहीं आता किस अजीब तरह का गरीब देश है. एक तरफ ए दिन बचकाने बयानों से देश के गरीब का मजाक उड़ाने वाली कांग्रेस सरकार के नेता-न्यान्गले हैं और एक तरफ पाकिस्तान और चाइना जैसे देश. पडोसी चाहे कैसा भी हो अगर आप कमज़ोर हो तो कोई भी आपके न्यूज़ पेपर और दूध की बोतलें चुरा लेगा. अगर आप कुछ ज्यादा ही कमज़ोर हो तो हो सकता है की आपके घर की रजिस्ट्री भी अपने नाम करवा ले. खैर वो आपके और आपके पडोसी की बात है लेकिन यहाँ मुद्दा है भारत की संप्रभुता और सम्मान का. सम्मान तो किसी भी हालत में नहीं जाना चाहिए चाहे 2-4 नेताओं को या फिर पार्टियों को जाना पड़े. आज सुबह ही देश के सबसे बड़े और पूजे हुए परिवार के सबसे युवा लड़के का बयान सुना गरीबी पे. उन्होंने कहा, गरीबी सिर्फ मन में है, हकीकत में नहीं. अगर चाहो तो गरीबी से मन को मजबूत करके और कॉन्फिडेंस के सहारे अमीर बना जा सकता है. ठीक है आप जिस माहौल से आये हैं आपने या तो गरीबी देखि नहीं है, या फिर आप सच में सोचने समझने में कुछ दिक्कत महसूस कर रहे हैं. माननीय, इस देश के 82 करोड़ लोगों के लिए आप ही लाये हैं खाद्य सुरक्षा बिल. गरीबी का मज़ाक उडाना बंद करो और उस दो कौड़ी के देश पाकिस्तान के बारे में कुछ करने का सोचो. वैसे किया क्या जा सकता है इस बारे में अभी तक एक भी जगह नहीं सुना. सब देश के प्रधानमंत्री को या सरकार को गाली देने में लगे हैं. गुस्सा अपनी जगह सही है लेकिन इस का इलाज क्या है? या इलाज है ही नहीं? ऐसा नहीं है की हम नपुंसक है, लेकिन अहिंसा के समर्थक हैं. लेकिन कब तक? क्या हम सिर्फ पाकिस्तान के पास परमाणु बम है इस बात को सोच के डरते रहेंगे? और कोई कारण हो सकता है तो मेरी नजर में नहीं है सिवाय कुछ स्तरहीन अफवाहों के जिसमे ये कहा गया है की देश के नेताओं के काले धन के राज़ हैं पाकिस्तान के पास. सच चाहे जो भी है एक बात तय है की भारत के एक भी सपूत के शरीर का एक कतरा खून भी नहीं बहना चाहिए और अब तक हजारों मर चुके हैं. माननीय मनमोहन सिंह जी, अगर कुछ कांग्रेसी लोगों का मरना आपको नहीं सुहाया तो इन सैनिकों की माओं ने क्या गुनाह किया है जिन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी  की सबसे महत्वपूर्ण चीज़ हँसते हँसते देश की सीमा पे भेज दी? याद है वो दिन जब एक शहीद की पत्नी को 5 लाख देने गए थे एक नेताजी और उस शहीद की पत्नी ने 5 लाख रुपये यह कहके लौटा दिए थे की " इन पैसों से बुलेट प्रूफ जैकेट खरीद ले भारत सरकार अपने सैनिकों के लिए, क्यूंकि  उस बेचारी भोली इंसान को बताया गया था की उसके उसके पति की मौत बुलेटप्रूफ जैकेट नहीं होने की वजह से हुई है. हर चीज़ को आप पैसे में मत तोलो, इंसान मरे हैं जानवर नहीं. शर्म बची हो थोड़ी भी तो प्लीज ज्यादा नहीं तो कल मीडिया के सामने आके दो-तीन गलियां ही दे देना पाकिस्तान को, इससे ज्यादा तो आपसे कुछ होगा भी नहीं.
-Simply Sushant

Monday, 22 July 2013

डायरी का पन्ना...

सूरज की रोशनी जब चादर पे पड़ी तब जा के होश आया, की दिन निकल आया था. उठ जाना चाहिए या सोता रहू? पिछले कुछ दिनों ने इतने कारण दे दिए हैं सोते रहने के की अब नींद ही सब कुछ थी. या फिर यूँ कहूँ की मैं डर के बहार नहीं निकल पा रहा. डर , वो चीज़ जो एक मजबूत से मजबूत शेर को भी रिंग मास्टर का घुलाम बना देता है, मैं तो फिर भी साधारण कद काठी का इंसान हूँ. लेकिन डर है तो आखिर किस चीज़ का, असफलता का? लोगों के कमाई से जुड़े सवालों से बचने का रास्ता मेरी नींद है? जब से पढाई पूरी हुई है, बस एक सवाल सबकी जुबां पे है, अब क्या? मन करता है जवाब दूँ इस चीज़ का और बिलकुल उसी रईसी से जो बचपन में थी, " काम करो अपना".मुह पे आके शब्द रुक जाते हैं,आखिर अब न वो बचपन रहा और न वो मस्ती. 22 साल आखिर कोई छोटी उम्र नहीं होती. "बच्चा नहीं है अब"- ये लाइन तो आजकल फील भी नही देती.

हाँ बड़ा तो हो गया हूँ, सब होते हैं! मैं कोई नया तो नहीं हूँ?और कोई आप्शन भी तो नहीं था. अब तो एडल्ट जोक्स पे हंसी भी नहीं आती. अपने ही नौकरी लग चुके बैच  मैट्स के सामने अपने आपको हल्का आंकने लगा हूँ. हर इंसान जो मुझे मिलता है से अपने आपको तोलने लगा हूँ. कैसा लग रहा हूँ, क्या पहनना है, चार लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे? वगैरह वगैरह! लेकिन इन सब के बीच मैं एक ऐसी चीज़ को साबित करने में लगा हूँ, " मैं भी कुछ हूँ". मुझे सच में नहीं मतलब की किरण आंटी की भाभी के लड़के का HCL में 9 लाख का प्लेसमेंट हुआ या फिर, फिर सुनील भैया का लड़का IIT खरगपुर से BTECH कर रहा है. मुझे क्या लेना इस बात से की मोहल्ले की कोंसी लड़की ने मेहंदी कम्पटीशन में फर्स्ट प्राइज जीता. मैं इंसान हूँ या प्रेशर कुकर?

पहले भी compare करते थे लोग, लेकिन तब दोस्त हुआ करते थे साथ में! दोस्त, बिलकुल आपकी ही फ्रीक्वेंसी के साथ tuned कुछ अजीब से लोग जो आपके साथ होते हैं तब जब आप पेपर में फ़ैल होते हैं, तब जब आप एक ही लड़की को पसंद कर लेते हैं, तब जब आपको बियर पीते हुए पकडे जाने के डर से  पुलिस की गाडी के आगे भागना पड़ता है , और तब भी जब आपकी आपसे तगड़े लोगों से लडाई होती है. लेकिन ऐसा भी तो अब कोई नहीं था. सब बिजी हो गए थे और जो कहते थे की " तू तो मेरा भाई है", अब इस भाई को ऑलमोस्ट भूल ही गए थे. दोस्तों की लिस्ट इतनी कॉम्पैक्ट हो गयी है की, अगर दोस्तों के नाम लिखे कागज़  पे एक स्याही का कतरा गिर जाये तो सारे नाम छुप जाएँ. एक आधे हैं ऐसे जिन्हें, "अपनी वाली को बोल के कोई पटवा दे यार" टाइप बातों से फुर्सत नहीं मिलती. यानी कुल मिला के कोई ऐसा नहीं है जिसके साथ मैं बैठ के एक बोतल खोल सकूँ और बोल सकूँ, " बकवास बंद कर यार, I AM SERIOUS".

एक 22 साल के लड़के की ज़िन्दगी का सबसे बुरा किस्सा??? उसकी अपनी गर्ल फ्रेंड की शादी का कार्ड. लिख लो दोस्तों, आसान नहीं है. मम्मी पापा से भी एक लिमिटेड बात ही शेयर की जा सकती है, सारी नहीं. इसलिए कितनी ही बार मुझ जैसे लोग रात को अपनी हालत पे रोते हुए आतिफ असलम के गाने सुनते हैं. 
चलो ये सब तो फिर भी सह सकता है एक इंसान , लेकिन जो नहीं सह सकता वो है अपनी माँ का दुखी चेहरा. आजकल मम्मी से बात होती है तो सिर्फ इन शब्दों के साथ " ये फॉर्म भरा? वो , उसके रिजल्ट का क्या हुआ?"  
पापा तो फिर भी शायद अपनी चिंता छुपा लेते हैं, लेकिन माँ की ये चिंता तो तोड़ ही देती है.

इन सब बातों को पिछले काफी दिनों से लगातार सह सह के पूरी तरह टूट गया हूँ , थक गया हूँ ये सोच सोच के की क्यूँ हो रहा है ये सब! क्या कभी मैं इन सवालों के जवाब दे पाउँगा अपने आप को? लेकिन मन में एक विश्वास ज़रूर है की ऊपर उठूँगा इन सब चीज़ों से, एक दिन मैं भी अपने मम्मी पापा का सर गर्व से ऊँचा उठाऊंगा! 
-Simply