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Wednesday, 21 August 2013

ताकतवर बनना है, हैवान नहीं .......

ज़िन्दगी में एक सबक सबने सुना होगा और याद भी रखा होगा, जिसकी लाठी उसकी भैंस! यानि की जिसके पास शक्ति, बात उसी की मानी जाएगी. मैं इस चीज़ में ज्यादा विश्वास नहीं करता, (शायद मेरी कद-काठी की वजह से),लेकिन इतना तय है की इस बात ने बहुत कुछ गड़बड़ कर दिया.youtube के पन्नो को पलटते हुए, 1992 के बाबरी मस्जिद विध्वंस के बारे में जुड़े कुछ विडियो देखे और यकीन मानो, एक हिन्दू होने की जो अनुभूति थी मन में, वो जाती रही!
दोस्तों, ये जाती पाती धर्म, अधर्म, ये सब मुझे नहीं पता किसने बनाये हैं और न ही ये पता है की इन सब को मानने नहीं मानने से होता क्या है, लेकिन इतना जनता हूँ जब किसी को धर्म के नाम पे जिंदा जलाया जाता होगा तो दर्द बहुत होता होगा. क्या कर सकते हैं, इंसान की चमड़ी है, कोई चाइना का खिलौना नहीं जो सस्ते में वापिस मिल जायेगा. जितनी उम्र नहीं है उससे ज्यादा तो दंगे देखे हैं (असल में सुने हैं) हम लोगों ने. क्या मिलता है इन दंगो से? लोगों के घर जल जाते हैं, महिलाओं से बलात्कार, घर के छोटे छोटे बच्चो को मार देना और भी न जाने क्या क्या? लेकिन फायदा किसका? शायद दंगो के बाद के राहत कोष को सँभालने वालों का? या फिर धर्म की बात करने वाले पंडितों,मौलवियों का?
सबसे पहले जो दंगे के बारे में सुना वो था 2002 का गुजरात दंगा. कुछ ने कहा हिन्दुओं ने मारा, कुछ ने कहा मुस्लमान ने मारा लेकिन सच तो ये है , की इंसान ने इंसान को मारा ! और सबसे दुःख की बात, कोई अपने आप को दोषी नहीं मानेगा. हत्या, बलात्कार, जिंदा जलाना ये सब ने बहुत दुखी किया. उसके बाद ज्यों ज्यों पढना शुरू किया सामने आया मुंबई 1993 का दंगा. उसमे भी सेम चीज़ थी. इंसान ने इंसान को मारा और फिर शुरू हुई राजनीती. बाल ठाकरे विरुद्ध मुसलमानों की राजनीती शुरू हुई, लेकिन इन सब से ऊपर एक बात सामने आती है वो है, लाल रंग का खून अब लाल रंग का पानी बन चूका है.
1984 में सिखों का कत्ले आम हुआ और अभी थोड़ी देर पहले अर्नब जी के न्यूज़ ऑवर शो में Jagdish Tytler की डिबेट उस मुद्दे पे मैंने सुनी, सिर्फ इतना कहा जा सकता है की जिस देश में इंसानियत के पाठ सिखाये जाते हों, वहां ऐसे काण्ड होने के बाद भी सब अपने आप को बचाने में लगे हैं.
“ताकतवर था इसलिए मैंने राज किया अच्छे से, अच्छे से राज किया इसलिए ताकतवर नहीं था” ये है आज की सच्चाई. मुस्लमान इंसान है और हिन्दू भी इंसान है. दोनों के खून का रंग लाल है, दोनों की शारीरिक रचना एक है लेकिन बदकिस्मती की लोगों की सोच एक नहीं है. भारत में ऐसे बहुत से किस्से हैं, जिनमे गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाले दी जाती हैं. ज्यादा दूर नहीं जाऊंगा, मेरे शहर में एक मंदिर है हनुमान जी का बड़ा सा, और उस मंदिर के अन्दर जाने के रस्ते के बिलकुल नज़दीक से एक मस्जिद का रास्ता है, और देखा जाये दूर से तो वो मस्जिद ऊँचाई पे स्थित है, यानि की दूर से लगता है मंदिर के ऊपर ही बनी है. जिस देश का अब तक का सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रपति मुस्लमान रहा हो, और जिस देश में मुस्लिम रक्षाबंधन के त्यौहार को अपना समझ के मनाते हों, उस देश में इस भेदभाव का क्या काम? सोहार्द्र और शांति के लिए क्या हम हमारे धर्मों के झूठे ढोंग को पीछे नहीं छोड़ सकते? याद रखना, हिन्दुओं का सबसे बड़ा त्यौहार “दिवाली” “अली” के बिना अधुरा है और मुसलमानों का सबसे बड़ा त्यौहार ईद देने वाला “रमजान” का महिना “राम” के बिना अधुरा है! हम सब एक हैं.................अलग नहीं!


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