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Monday, 22 July 2013

डायरी का पन्ना...

सूरज की रोशनी जब चादर पे पड़ी तब जा के होश आया, की दिन निकल आया था. उठ जाना चाहिए या सोता रहू? पिछले कुछ दिनों ने इतने कारण दे दिए हैं सोते रहने के की अब नींद ही सब कुछ थी. या फिर यूँ कहूँ की मैं डर के बहार नहीं निकल पा रहा. डर , वो चीज़ जो एक मजबूत से मजबूत शेर को भी रिंग मास्टर का घुलाम बना देता है, मैं तो फिर भी साधारण कद काठी का इंसान हूँ. लेकिन डर है तो आखिर किस चीज़ का, असफलता का? लोगों के कमाई से जुड़े सवालों से बचने का रास्ता मेरी नींद है? जब से पढाई पूरी हुई है, बस एक सवाल सबकी जुबां पे है, अब क्या? मन करता है जवाब दूँ इस चीज़ का और बिलकुल उसी रईसी से जो बचपन में थी, " काम करो अपना".मुह पे आके शब्द रुक जाते हैं,आखिर अब न वो बचपन रहा और न वो मस्ती. 22 साल आखिर कोई छोटी उम्र नहीं होती. "बच्चा नहीं है अब"- ये लाइन तो आजकल फील भी नही देती.

हाँ बड़ा तो हो गया हूँ, सब होते हैं! मैं कोई नया तो नहीं हूँ?और कोई आप्शन भी तो नहीं था. अब तो एडल्ट जोक्स पे हंसी भी नहीं आती. अपने ही नौकरी लग चुके बैच  मैट्स के सामने अपने आपको हल्का आंकने लगा हूँ. हर इंसान जो मुझे मिलता है से अपने आपको तोलने लगा हूँ. कैसा लग रहा हूँ, क्या पहनना है, चार लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे? वगैरह वगैरह! लेकिन इन सब के बीच मैं एक ऐसी चीज़ को साबित करने में लगा हूँ, " मैं भी कुछ हूँ". मुझे सच में नहीं मतलब की किरण आंटी की भाभी के लड़के का HCL में 9 लाख का प्लेसमेंट हुआ या फिर, फिर सुनील भैया का लड़का IIT खरगपुर से BTECH कर रहा है. मुझे क्या लेना इस बात से की मोहल्ले की कोंसी लड़की ने मेहंदी कम्पटीशन में फर्स्ट प्राइज जीता. मैं इंसान हूँ या प्रेशर कुकर?

पहले भी compare करते थे लोग, लेकिन तब दोस्त हुआ करते थे साथ में! दोस्त, बिलकुल आपकी ही फ्रीक्वेंसी के साथ tuned कुछ अजीब से लोग जो आपके साथ होते हैं तब जब आप पेपर में फ़ैल होते हैं, तब जब आप एक ही लड़की को पसंद कर लेते हैं, तब जब आपको बियर पीते हुए पकडे जाने के डर से  पुलिस की गाडी के आगे भागना पड़ता है , और तब भी जब आपकी आपसे तगड़े लोगों से लडाई होती है. लेकिन ऐसा भी तो अब कोई नहीं था. सब बिजी हो गए थे और जो कहते थे की " तू तो मेरा भाई है", अब इस भाई को ऑलमोस्ट भूल ही गए थे. दोस्तों की लिस्ट इतनी कॉम्पैक्ट हो गयी है की, अगर दोस्तों के नाम लिखे कागज़  पे एक स्याही का कतरा गिर जाये तो सारे नाम छुप जाएँ. एक आधे हैं ऐसे जिन्हें, "अपनी वाली को बोल के कोई पटवा दे यार" टाइप बातों से फुर्सत नहीं मिलती. यानी कुल मिला के कोई ऐसा नहीं है जिसके साथ मैं बैठ के एक बोतल खोल सकूँ और बोल सकूँ, " बकवास बंद कर यार, I AM SERIOUS".

एक 22 साल के लड़के की ज़िन्दगी का सबसे बुरा किस्सा??? उसकी अपनी गर्ल फ्रेंड की शादी का कार्ड. लिख लो दोस्तों, आसान नहीं है. मम्मी पापा से भी एक लिमिटेड बात ही शेयर की जा सकती है, सारी नहीं. इसलिए कितनी ही बार मुझ जैसे लोग रात को अपनी हालत पे रोते हुए आतिफ असलम के गाने सुनते हैं. 
चलो ये सब तो फिर भी सह सकता है एक इंसान , लेकिन जो नहीं सह सकता वो है अपनी माँ का दुखी चेहरा. आजकल मम्मी से बात होती है तो सिर्फ इन शब्दों के साथ " ये फॉर्म भरा? वो , उसके रिजल्ट का क्या हुआ?"  
पापा तो फिर भी शायद अपनी चिंता छुपा लेते हैं, लेकिन माँ की ये चिंता तो तोड़ ही देती है.

इन सब बातों को पिछले काफी दिनों से लगातार सह सह के पूरी तरह टूट गया हूँ , थक गया हूँ ये सोच सोच के की क्यूँ हो रहा है ये सब! क्या कभी मैं इन सवालों के जवाब दे पाउँगा अपने आप को? लेकिन मन में एक विश्वास ज़रूर है की ऊपर उठूँगा इन सब चीज़ों से, एक दिन मैं भी अपने मम्मी पापा का सर गर्व से ऊँचा उठाऊंगा! 
-Simply

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